इससे क्या ही होगा
हजारो का काफ़िला था साथ मेरा मगर अब बस अकेला हूँ,
ग़लती सबकी कान्हा हो सकती है शायद मैं ही ग़लत रहा हूँगा।
अब अकेले में ही जीना सीख लिया हमने, फिर से भिड़ में नहीं रहना,
जब चाहत ही नहीं रही किसी की हमें तो तेरे चाहने से क्या होगा।
जज्बात, लफ्ज़ सब बिक चुके हैं पैसो के बाजार में,
कीमत लग चुकी है मोहब्बत की, अब तो बस व्यापार होगा,
हमारा दिल तो पत्थर का हो चुका है ना जाने कबसे,
जब मेरी ही धड़कने ना रही तो तेरी धड़कनों से क्या होगा।
मिट चुकी है हसरते सारी अब बाकी ना कोई उम्मीद बची है,
जला दिया है खुद को जीते जी हमने, अब तो बस खाक ही होगा,
फूल और पते तो आ ही जाते हैं पेड़ो पर बहार आ जाने से,
मेरी जली हुई जिंदगी की राख में इन बाहरो से क्या होगा,
धीरे-धीरे करके जलते रहे, लाख बुझाया मगर दर्द सुलगता रहा,
आँखे भले ही नम हुई मेरी, मगर दिल मेरा यू ही जलता रहा,
समंदर भी नहीं बुझा सकता मेरे अंदर लगी इस आग को,
तो भला इस हल्की सी बरसातो से क्या ही होगा,
महफिल हो या तन्हाई अकेले ही खुश रह लेते हैं,
जो सुख मिलता है तन्हाइयो से बातें करने से वो सुख कँहा होगा,
लोग सोचते हैं कि क्या हम भी रोया करते हैं क्या कभी,
हमने कहा है जो मुस्कुराने से ना हुआ वो भला रोने से क्या ही होगा।

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