इससे क्या ही होगा
हजारो का काफ़िला था साथ मेरा मगर अब बस अकेला हूँ,
ग़लती सबकी कान्हा हो सकती है शायद मैं ही ग़लत रहा हूँगा।
अब अकेले में ही जीना सीख लिया हमने, फिर से भिड़ में नहीं रहना,
जब चाहत ही नहीं रही किसी की हमें तो तेरे चाहने से क्या होगा।
जज्बात, लफ्ज़ सब बिक चुके हैं पैसो के बाजार में,
कीमत लग चुकी है मोहब्बत की, अब तो बस व्यापार होगा,
हमारा दिल तो पत्थर का हो चुका है ना जाने कबसे,
जब मेरी ही धड़कने ना रही तो तेरी धड़कनों से क्या होगा।
मिट चुकी है हसरते सारी अब बाकी ना कोई उम्मीद बची है,
जला दिया है खुद को जीते जी हमने, अब तो बस खाक ही होगा,
फूल और पते तो आ ही जाते हैं पेड़ो पर बहार आ जाने से,
मेरी जली हुई जिंदगी की राख में इन बाहरो से क्या होगा,
धीरे-धीरे करके जलते रहे, लाख बुझाया मगर दर्द सुलगता रहा,
आँखे भले ही नम हुई मेरी, मगर दिल मेरा यू ही जलता रहा,
समंदर भी नहीं बुझा सकता मेरे अंदर लगी इस आग को,
तो भला इस हल्की सी बरसातो से क्या ही होगा,
महफिल हो या तन्हाई अकेले ही खुश रह लेते हैं,
जो सुख मिलता है तन्हाइयो से बातें करने से वो सुख कँहा होगा,
लोग सोचते हैं कि क्या हम भी रोया करते हैं क्या कभी,
हमने कहा है जो मुस्कुराने से ना हुआ वो भला रोने से क्या ही होगा।

Poonam Sheoran 04-Jun-2026 05:45 PM
जी चाहता है आज हम भी आपकी हाँ में हाँ मिलाएँ,
मन किया इन तन्हाइयों में आपका थोड़ा साथ निभाएँ।
सही कहा आपने,
जो मुस्कुराने से ना हुआ, वो रोने से क्या ही होगा।
जिसे चाहत ही ना हो, उसे चाहने से क्या ही होगा।
बरसों से धड़का ना हो जो दिल,
हम भला उसे कहाँ धड़का पाएँगे।
एक दशक से आपने इस दिल को नाचीज़ ठहराया,
चंद पलों में हम आपका ये फ़ैसला कहाँ बदल पाएँगे।
सच लिखा आपने,
जहाँ बिका करते थे जिस्म,
आज दिल बिक रहे हैं उस बाज़ार में।
तुम्हें जलता देख,
बस खड़ी हूँ लाचार मैं।
जी चाहता है आज हम भी आपकी हाँ में हाँ मिलाएँ,
इन तन्हाइयों में आपका थोड़ा तो साथ निभाएँ।
दिल ने कहा,
जब नम हो चुकी हैं आँखें आपकी, तो अब हम भी चुप हो जाएँ।
फिर बड़ी कशमकश पे पड़ गया दिल हमारा,
सोचा बस हाँ में हाँ मिलाएँ,
या आपको थोड़ा सच भी बताएँ।
बड़ा ज़ोर देकर पूछा हमने ख़ुद से,
और तय किया,
कि अब आपको थोड़ी हक़ीक़त दिखाएँ।
अब आप बताइए,
जो खारा समंदर किसी की प्यास ना बुझा पाए,
वो आपके अंदर लगी आग कैसे बुझाए?
आपने तो खड़े कर दिए सवाल हमारे इरादों पर
अब हम आपको कैसे समझाएँ...?
माना गलती सबकी नहीं होती,
पर एक अकेला इंसान भी, पूरा ग़लत कहाँ होता है
अगर रिश्ते बिखरते हैं,
तो कुछ गुनाह तो हर किरदार के हिस्से होता है।