09-Sep-2025  

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मेरी ज़िन्दगी की कहानी अभी बाकी है। मेरे सवाल बाकी है

खुद से कहता हूँ—ये जो चेहरा शांत समंदर-सा है,
भीतर कहीं मुझमें तूफ़ानों का घर-सा है।
बाहर की चुप्पियों में मोम-सा ठहरा हुआ मैं,
अंदर लहरों का शोर  “कहाँ चल पड़ा तू?” कहता हुआ मैं।

साहिल पे बैठा हुआ, रेत पर नाम लिखता हूँ,
गुजरता है जब कोई पास से तो चुपचाप  मिटा देता हूँ।
धड़कनों की आवाजे अंदर ही अंदर चुप हो जाती हैं,
ख़्वाबों की कश्तियाँ हकीकत के तुफानो में डूब जाती हैं।

कभी लगता है मैं चिल्लाऊं समंदर की लेहरो के शोर जैसा ,
कभी लगता है मैं चुपचाप बैठा रहूँ इस अँधेरी रात के जैसा ।
मैं अपनी ही परछाइयों और जज्बाताओ से रोज़ टकराता हूँ ,
बड़ी अजीब सी हो गई है हालत मेरी, ना सह पाता हूँ ना बता पाता हूँ ।

कभी-कभी दिल रोशनी को भी बोझ समझ लेता है,
खुशियों के पैमानों को रोज़-रोज़ परख लेता है।
मैं एक अधूरा सा खवाब हूँ , जिसे मैं चाह पर भी पूरा ना कर पता हूँ ,
हँसता हूँ महफ़िल में, मगर भीतर ही भीतर टूट कर बिखर जाता हूँ ।

बाहर अगर शांति है, तो ये कोई ढोंग नहीं,
अंदर मेरी लड़ाइयाँ हैं—पर मैं कहीं खोया नहीं।
जब थकता हूँ तो माँ के आंचल में सो लेता हूँ,
लहरों की ताल पर अपना दुख थोड़ा-थोड़ा बहा देता हूँ।

मैं थक तो गया हूँ ए  ज़िन्दगी, मगर अभी मेरे कुछ क़र्ज़ बाकी है ,
तू और सत्ता ले मुझे कोई परवाह नहीं , अभी मुझे में हिम्मत बाकी है। 
तुझे भी जवाब देना पड़ेगा तेरे हर सितम का, तू तयार रहना ,
तूने अभी तक सिर्फ मेरे हौसले देखे है , अभी मेरे सवाल बाकी है।