मेरी ज़िन्दगी की कहानी अभी बाकी है। मेरे सवाल बाकी है
खुद से कहता हूँ—ये जो चेहरा शांत समंदर-सा है,
भीतर कहीं मुझमें तूफ़ानों का घर-सा है।
बाहर की चुप्पियों में मोम-सा ठहरा हुआ मैं,
अंदर लहरों का शोर “कहाँ चल पड़ा तू?” कहता हुआ मैं।
साहिल पे बैठा हुआ, रेत पर नाम लिखता हूँ,
गुजरता है जब कोई पास से तो चुपचाप मिटा देता हूँ।
धड़कनों की आवाजे अंदर ही अंदर चुप हो जाती हैं,
ख़्वाबों की कश्तियाँ हकीकत के तुफानो में डूब जाती हैं।
कभी लगता है मैं चिल्लाऊं समंदर की लेहरो के शोर जैसा ,
कभी लगता है मैं चुपचाप बैठा रहूँ इस अँधेरी रात के जैसा ।
मैं अपनी ही परछाइयों और जज्बाताओ से रोज़ टकराता हूँ ,
बड़ी अजीब सी हो गई है हालत मेरी, ना सह पाता हूँ ना बता पाता हूँ ।
कभी-कभी दिल रोशनी को भी बोझ समझ लेता है,
खुशियों के पैमानों को रोज़-रोज़ परख लेता है।
मैं एक अधूरा सा खवाब हूँ , जिसे मैं चाह पर भी पूरा ना कर पता हूँ ,
हँसता हूँ महफ़िल में, मगर भीतर ही भीतर टूट कर बिखर जाता हूँ ।
बाहर अगर शांति है, तो ये कोई ढोंग नहीं,
अंदर मेरी लड़ाइयाँ हैं—पर मैं कहीं खोया नहीं।
जब थकता हूँ तो माँ के आंचल में सो लेता हूँ,
लहरों की ताल पर अपना दुख थोड़ा-थोड़ा बहा देता हूँ।
मैं थक तो गया हूँ ए ज़िन्दगी, मगर अभी मेरे कुछ क़र्ज़ बाकी है ,
तू और सत्ता ले मुझे कोई परवाह नहीं , अभी मुझे में हिम्मत बाकी है।
तुझे भी जवाब देना पड़ेगा तेरे हर सितम का, तू तयार रहना ,
तूने अभी तक सिर्फ मेरे हौसले देखे है , अभी मेरे सवाल बाकी है।

Poonam Sheoran 01-Jun-2026 09:15 PM
अंदर जो तुमने तूफान समेटा है एक दिन तो वो बाहर आएगा...
आखिर कब तक यू मोम से ठगरे रहोगे मोम भी एक दिन पिगल जाएगा...
और शायद तब, "कहा चल पड़ा तू?" का जवाब तुम्हे मिल जाएगा...
रेत पर लिख कर नाम, तुम मिटा भी दो किसीका मगर तुम्हारी उंगलियों के निशान तो रह जाते है...
और वही निशान, किसी और के दिल को भाह जाते है...
तुम चिलाओ, मैं सुनूंगी तुम्हे, जैसे पहाड़ो से बहती कोई धारा हो...
तुम चुपचाप भी बैठे अगर, मैं निहारूंगी तुम्हे, जैसे ठहरी हुई कोई शाम हो...
तुम्हारा लिखा तो समझ आता है कि तुम सह नहीं पाते हो जब कोई पूछता है,
तो तुम बता नहीं पाते हो शायद इसीलिए, बस कागज से कह जाते हो...
मगर कैसे समझाऊँ तुम्हे कि इसी वजह से तुम थोड़े और दिलकश बन जाते हो...
यू ना परखा करो, अपने चहरे की मुस्कुराहट को दिल को ये क़ुबूल नहीं होता
क्यू खुशियों के पैमानो को लेके बैठ जाते हो? मुसर्रत का तो कोई उसूल नहीं होता
तुम्हारा थक जाना तो मंजूर है पर तुम्हारा हँसते हुये बिखर जाना, ना-गवारा है
अगर तुम खुद को अधूरा सा ख्वाब लिखोगे... तो मैं कहूँगी,
आसमान में देखो, एक टूटता हुआ सितारा है बाहर जो शांति है, वो तुम्हारा नूर है अंदर जो लड़ाइयाँ है,
वो जिंदगी का दस्तूर है पूछ लो तुम जिंदगी से सवाल मैं अपने हर सवाल का जवाब, तुम्हारी कविताओं में ढूंढ रही हु...
मांग लो जिंदगी के हर सितम का हिसाब मैं हर सितम पर लिखी तुम्हारी खूबसूरत नज़्म पढ़ रही हु..
हालात-ए-जिंदगी बयां करते रहना लिख कर मैं उन हालातो में, तुम्हारे जज़्बात ढूंढ रही हु...